पश्चिम बंगाल में विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण Special Intensive Revision-SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ध्यान देने वाली है। मई महीने में पश्चिम बंगाल में SIR अभियान के दरम्यान लोगों के नाम मतदाता सूची से हट जाने की तमाम शिकायतों के मद्देनजर अदालत ने कहा कि मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटना और उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त होना, दोनों अलग अलग कानूनी विषय हैं। इस मामले में शीर्ष अदालत ने साफ किया कि नागरिकता का निर्धारण केवल विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकता है और चुनाव आयोग को इस संबंध में स्वयं निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। यह ऐसे नागरिकों के लिए बड़ी राहत की बात है, जिनका नाम SIR से हट गया था। पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। इसके बाद कई प्रभावित लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि केवल मतदाता सूची से नाम हटाने के आधार पर उन्हें नागरिकता संबंधी संदेह के दायरे में लाना अनुचित है। लाईव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने इस चिंता को गंभीरता से लिया और मामले की सुनवाई की। सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि कि मतदान का अधिकार तथा नागरिकता दो अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं। अदालत ने कहा कि नागरिकता पर निर्णय केवल विधिक प्रक्रिया के अनुरूप ही होगा। देखा जाए तो नागरिकता को लेकर जो देश के लोगों में भ्रम था सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से बहुत हद तक दूर हो गई होगी। यह उन लाखों लोगों के लिए राहत की बात मानी जा रही है जिनके नाम किसी कारणवश मतदाता सूची से हट जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह साफ हो गया स्पष्ट हो गया कि केवल निर्वाचन सूची में नाम न होने से किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता प्रभावित नहीं होती। इससे नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा को बल मिलेगा। ऐसा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से चुनाव आयोग और केंद्र सरकार की भूमिकाओं की एक अच्छी व्याख्या भी सामने आई है। जिसकी वजह से यहआदेश भविष्य के नागरिकता विवादों में महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल बन सकता है।
