केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल चार पन्नों के हलफनामे में अदालत से बिना शर्त माफी मांगी है। यह हलफनामा अदालत की अवमानना के नोटिस के जवाब में बुधवार देर रात दाखिल किया गया। गृह सचिव ने स्पष्ट किया कि अदालत के आदेश का जानबूझकर उल्लंघन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस की ओर से मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित करने का अनुरोध स्थिति की गंभीरता और राजधानी में कानून-व्यवस्था बिगड़ने से रोकने की जरूरत को देखते हुए उचित था। इस हलफनामे में उन्होंने पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि और निर्णय लेने की प्रक्रिया को विस्तार से प्रस्तुत किया। सरकार का यह रुख अदालत के प्रति सम्मान दर्शाता है साथ ही प्रशासनिक निर्णय की मजबूरी को भी रेखांकित करता है। हलफनामे के अनुसार 9-Oct.-2026 की रात 10 बजे से 10-Oct.-2026 की रात 10 बजे तक रायसीना हिल्स के चार किलोमीटर के दायरे में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित की गई थीं। यह पाबंदी पूरी तरह सीमित भौगोलिक क्षेत्र और निश्चित समय सीमा के अंदर लागू की गई थी। प्रशासन ने इसे व्यापक स्तर पर लागू करने के बजाय केवल संवेदनशील क्षेत्र तक ही सीमित रखा। इस दौरान राजधानी के अन्य हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सामान्य रूप से चालू रहा। सीमित दायरे में की गई इस व्यवस्था से आम नागरिकों को होने वाली असुविधा को भी कम से कम रखने का प्रयास किया गया। गृह सचिव ने इसे स्थिति की गंभीरता के अनुरूप संतुलित कदम बताया। गृह सचिव ने स्पष्ट किया कि यह पाबंदी केवल मोबाइल इंटरनेट सेवाओं तक सीमित थी। इसका असर गैर-मोबाइल इंटरनेट सेवाओं या वाई-फाई और ब्रॉडबैंड जैसी दूरसंचार सेवाओं पर नहीं पड़ा। घरों और कार्यालयों में चल रही वायर्ड इंटरनेट सुविधाएं पूरी तरह सामान्य रहीं। इस भेदभावपूर्ण व्यवस्था से यह सुनिश्चित किया गया कि आवश्यक डिजिटल सेवाएं बाधित न हों। केवल मोबाइल नेटवर्क पर नियंत्रण रखकर प्रशासन ने सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का लक्ष्य हासिल करने की कोशिश की। इस तकनीकी सीमा का उल्लेख हलफनामे में विस्तार से किया गया है ताकि अदालत को पूरे परिदृश्य की सही तस्वीर मिल सके। गृह सचिव ने कहा कि सीमित समय और निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र में इंटरनेट सेवाओं को निलंबित करना वैधानिक सुरक्षा उपायों के साथ कुछ परिस्थितियों में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का मान्य तरीका माना जाता है। दिल्ली पुलिस ने 10-Oct.-2026 को होने वाले विरोध-प्रदर्शनों को रोकने के लिए यह कदम उठाया था। प्रशासन का मानना था कि सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए भीड़ को संगठित करने की आशंका को देखते हुए यह निलंबन आवश्यक था। उन्होंने जोर दिया कि यह निर्णय मनमाने ढंग से नहीं बल्कि स्थिति की गंभीरता का आकलन करने के बाद लिया गया। इस तर्क के साथ सरकार ने अदालत को आश्वस्त करने का प्रयास किया कि लोक व्यवस्था की रक्षा सर्वोपरि थी। 11-Oct.-2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पहले के आदेश के कथित उल्लंघन को लेकर गृह सचिव दिल्ली पुलिस आयुक्त और दिल्ली मेट्रो रेल निगम यानी DMRC के अध्यक्ष को अवमानना के नोटिस जारी किए थे। न्यायालय ने इससे पहले निर्देश दिया था कि इंटरनेट सुविधाएं बिना किसी बाधा के काम करनी चाहिए। इस आदेश के बावजूद 10-Oct.-2026 को मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित किए जाने को अदालत ने गंभीरता से लिया। नोटिस जारी होने के बाद गृह सचिव ने विस्तृत हलफनामा दाखिल कर पूरे मामले की सफाई दी। न्यायालय का यह कदम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल अधिकारों की रक्षा को लेकर उसकी सक्रिय भूमिका को दर्शाता है। दिल्ली पुलिस ने 10-Oct.-2026 को प्रस्तावित विरोध-प्रदर्शनों को शांतिपूर्ण तरीके से नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए थे। इनमें संवेदनशील क्षेत्रों में भीड़ जमाव को रोकने के साथ-साथ डिजिटल संचार पर अस्थायी नियंत्रण भी शामिल था। प्रशासन का तर्क था कि बिना पर्याप्त तैयारी के बड़े पैमाने पर प्रदर्शन कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकते थे। गृह सचिव ने हलफनामे में इन तैयारियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इंटरनेट निलंबन अंतिम विकल्प के रूप में अपनाया गया। उन्होंने अदालत को आश्वस्त किया कि भविष्य में ऐसे किसी भी कदम से पहले सभी वैधानिक प्रक्रियाओं का पूर्ण पालन किया जाएगा। इस पूरे प्रकरण से प्रशासनिक निर्णय लेने की प्रक्रिया और अदालती निगरानी के बीच संतुलन की जरूरत एक बार फिर उजागर हुई है।

By UJAGAR

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *