महाराष्ट्र के नासिक में शनिवार को गोदावरी नदी के पवित्र तट रामतीर्थ पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दोपहर 12:02 बजे धर्मध्वजा फहराकर नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले की तैयारियों का औपचारिक शुभारंभ किया। इस अवसर पर वैदिक मंत्रों की गूंज, शंखनाद और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच संतों, जनप्रतिनिधियों तथा हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। समारोह को लेकर रामतीर्थ परिसर में विशेष धार्मिक आयोजन किए गए थे। धर्मध्वजा फहराने के साथ ही आगामी कुंभ मेले को लेकर धार्मिक और प्रशासनिक गतिविधियों का सिलसिला तेज होने का संदेश दिया गया। वर्ष 2027 में आयोजित होने वाला यह सिंहस्थ कुंभ जुलाई 2028 तक चलेगा और इसमें देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। धर्मध्वजा फहराने से पहले राष्ट्रपति मुर्मू ने यज्ञकुंड में आहुति अर्पित की और विधि-विधान के साथ मां गोदावरी का पूजन किया। इसके बाद उन्होंने धर्मध्वजा के समक्ष सम्मान प्रकट करते हुए पुरोहितों के मंत्रोच्चार के बीच उसे फहराया। ध्वजा के आकाश में लहराते ही रामतीर्थ परिसर शंखनाद से गूंज उठा और उपस्थित श्रद्धालुओं ने धार्मिक उत्साह के साथ समारोह में भाग लिया। संपूर्ण अनुष्ठान पुरोहित संघ के अध्यक्ष चंद्रशेखर पंचाक्षरी तथा पुरोहित सतीश शुक्ल के नेतृत्व में संपन्न हुआ। सतीश शुक्ल ने कहा कि धर्मध्वजा केवल धार्मिक पहचान का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक स्मृतियों को वर्तमान से जोड़ने वाला पवित्र चिह्न भी है। उनके अनुसार, इस परंपरा के माध्यम से भारतीय आध्यात्मिक विरासत और सांस्कृतिक निरंतरता का संदेश सामने आता है। नासिक से लगभग 30 किलोमीटर दूर त्र्यंबकेश्वर में भी सिंहस्थ कुंभ मेले के अवसर पर धर्मध्वजा फहराने का समारोह आयोजित किया गया। यहां मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कुशावर्त तीर्थ और गोदावरी नदी के तट पर धार्मिक अनुष्ठानों के बीच ध्वजा फहराई। इस अवसर पर शृंगेरी पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य विधुशेखर भारती सहित संत-महात्मा और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। पुरोहितों ने मंत्रोच्चार के साथ मां गोदावरी की स्तुति की और इसके बाद संकल्प अनुष्ठान संपन्न कराया गया। धार्मिक विधियों के दौरान समस्त जीवों के सुख, शांति, समृद्धि और कल्याण की कामना की गई। नासिक और त्र्यंबकेश्वर में एक साथ आयोजित इन समारोहों ने सिंहस्थ कुंभ की धार्मिक परंपराओं और दोनों तीर्थस्थलों के महत्व को रेखांकित किया। सिंहस्थ कुंभ मेले की धार्मिक और ज्योतिषीय परंपरा में बृहस्पति का सिंह राशि में प्रवेश विशेष महत्व रखता है। इसी खगोलीय स्थिति के आधार पर इस आयोजन को सिंहस्थ कुंभ कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में गोदावरी के तट पर स्नान, पूजा और आध्यात्मिक अनुष्ठानों का विशेष पुण्यफल माना जाता है। धर्मध्वजा फहराने की परंपरा भी इसी धार्मिक पृष्ठभूमि से जुड़ी हुई है और इसे कुंभ आयोजन की तैयारियों के महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जाता है। राष्ट्रपति की उपस्थिति में रामतीर्थ पर संपन्न हुआ समारोह इस दृष्टि से विशेष महत्व रखता है कि इससे आगामी सिंहस्थ मेले के लिए धार्मिक गतिविधियों का औपचारिक आरंभ हुआ है। आने वाले समय में विभिन्न अखाड़ों, संतों और धार्मिक संस्थाओं की भागीदारी के साथ आयोजन से जुड़ी गतिविधियां और व्यापक होने की उम्मीद है। नासिक और त्र्यंबकेश्वर प्रशासन के सामने आगामी सिंहस्थ कुंभ के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों और विदेशों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए व्यापक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने की चुनौती होगी। आयोजन की विशालता को देखते हुए आधारभूत ढांचे के विकास, स्वच्छता, यातायात प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसके साथ ही पेयजल, स्वास्थ्य सेवाओं, सार्वजनिक सुविधाओं और भीड़ नियंत्रण जैसे विषय भी तैयारियों का अहम हिस्सा होंगे। कुंभ के दौरान प्रमुख घाटों, मंदिरों और तीर्थस्थलों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने के मद्देनजर विभिन्न विभागों के बीच समन्वय आवश्यक होगा। प्रशासनिक एजेंसियों की कोशिश है कि धार्मिक आयोजन की परंपराओं और श्रद्धालुओं की सुविधा के बीच बेहतर संतुलन बनाया जाए। समय रहते योजनाओं को लागू करना और उनकी नियमित समीक्षा करना इस बड़े आयोजन के सफल संचालन के लिए महत्वपूर्ण रहेगा। रामतीर्थ और त्र्यंबकेश्वर में धर्मध्वजा फहराए जाने के साथ ही 2027 के नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले की तैयारियों को धार्मिक आधार मिल गया है। यह आयोजन केवल स्नान और पूजा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें संतों, अखाड़ों, धार्मिक संस्थाओं, प्रशासनिक एजेंसियों और स्थानीय नागरिकों की व्यापक भागीदारी होगी। मेले के दौरान श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या को देखते हुए परिवहन, आवास, स्वच्छता, सुरक्षा और आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्थाओं को चरणबद्ध ढंग से विकसित करना होगा। नासिक और त्र्यंबकेश्वर की धार्मिक पहचान के साथ यह आयोजन क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को भी व्यापक रूप देगा। धर्मध्वजा के आरोहण ने इस लंबे आयोजन क्रम की शुरुआत का संकेत दिया है। अब सभी की निगाहें इस बात पर रहेंगी कि प्रशासन और संबंधित संस्थाएं समयबद्ध तैयारियों के जरिए श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षित, सुव्यवस्थित और सुविधाजनक कुंभ अनुभव किस तरह सुनिश्चित करती हैं।

By UJAGAR

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