नई दिल्ली में संसद के मानसून सत्र से पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गई। हाल ही में गठित नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) को बैठक में आमंत्रित किए जाने पर कई विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध जताया। विरोध दर्ज कराते हुए विपक्षी नेताओं ने बैठक से वॉकआउट कर दिया। इससे संसद सत्र शुरू होने से पहले ही सरकार और विपक्ष के बीच टकराव की स्थिति बन गई। विपक्ष का कहना है कि एनसीपीआई को अभी तक संसद में आधिकारिक मान्यता नहीं मिली है। ऐसे में उसे सर्वदलीय बैठक में आमंत्रित करना संसदीय परंपराओं के अनुरूप नहीं है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार राजनीतिक लाभ के लिए नए दल को महत्व देने की कोशिश कर रही है, जिसका उन्होंने विरोध किया। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बैठक के दौरान सभी राजनीतिक दलों से संसद की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने में सहयोग की अपील की। सरकार का पक्ष है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विभिन्न राजनीतिक समूहों से संवाद बनाए रखना आवश्यक है और इसी उद्देश्य से एनसीपीआई को बैठक में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया। एनसीपीआई का गठन हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से अलग हुए सांसदों द्वारा किया गया है। पार्टी ने संसद में अलग संसदीय दल के रूप में मान्यता के लिए आवेदन भी किया है। हालांकि इस प्रक्रिया पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। ऐसे में सर्वदलीय बैठक में उसकी मौजूदगी को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। विपक्ष ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह इस मुद्दे को संसद के दोनों सदनों में भी उठाएगा। माना जा रहा है कि मानसून सत्र के शुरुआती दिनों में इस मुद्दे पर जोरदार हंगामा देखने को मिल सकता है। सरकार जहां विधायी कार्यों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है, वहीं विपक्ष इस फैसले को लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ बताते हुए सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि एनसीपीआई को सर्वदलीय बैठक में आमंत्रित करने का फैसला केवल संसदीय प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक संकेत भी हैं। ऐसे समय में जब कई राज्यों में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, संसद के भीतर भी नए दलों की भूमिका और उनकी मान्यता का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण विषय बन सकता है।
