भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) के नाम और उसके आधिकारिक चुनाव चिह्न ‘फूल और घास’ के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी. आयोग ने अपने अंतरिम आदेश में साफ किया कि ममता बनर्जी और अरूप रॉय के नेतृत्व वाले दोनों ही गुट आगामी उपचुनावों में मूल पार्टी के नाम और निशान का उपयोग नहीं कर सकेंगे. चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को 18 सितंबर 2026 की सुबह 11 बजे तक अपनी प्राथमिकता के आधार पर तीन नए नामों और तीन फ्री सिंबल्स के विकल्प पेश करने का निर्देश जारी किया है. चुनाव आयोग के सामने तृणमूल कांग्रेस के दो प्रतिद्वंद्वी गुट आमने-सामने आ खड़े हुए हैं. इसमें एक गुट की कमान पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हाथ में है. वहीं दूसरे गुट का नेतृत्व अरूप रॉय कर रहे हैं. दोनों ही खेमे खुद को असली और वैध तृणमूल कांग्रेस बता रहे हैं. आयोग ने अपने आदेश में कहा कि चुनाव चिन्ह (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत विवाद के अंतिम और ठोस निपटारे के लिए विस्तृत समय की जरूरत है. वर्तमान में विधानसभा उपचुनावों की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और समय बेहद कम है. ऐसे में आयोग ने निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह अंतरिम व्यवस्था लागू की है.
- निर्वाचन आयोग के अंतरिम आदेश के मुताबिक दोनों में से कोई भी गुट अब अकेले ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकेगा. दोनों पक्षों को चुनाव लड़ने के लिए अलग-अलग नाम चुनने की छूट दी गई है.
- वे चाहें तो अपने नए नाम के साथ मूल पार्टी का संदर्भ जोड़ सकते हैं. इसके अलावा दोनों गुटों को पार्टी के आरक्षित चुनाव चिह्न ‘फूल और घास’ के उपयोग से वंचित कर दिया गया है.
- आयोग ने स्पष्ट किया है कि उपचुनाव लड़ने के लिए दोनों धड़ों को अधिसूचित फ्री सिंबल्स की लिस्ट में से ही कोई नया चुनाव चिह्न आवंटित किया जाएगा. इसके लिए दोनों पक्षों को 18 सितंबर सुबह 11 बजे तक अपनी पसंद बतानी होगी.
पार्टी के भीतर बगावत का बिगुल उस वक्त फूंका गया जब रीतब्रत बनर्जी ने चुनाव आयोग के सामने अपनी याचिका लगाई. उन्होंने दावा किया कि एआईटीसी की राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल 11 फरवरी 2025 को ही खत्म हो चुका था. इसके बाद उस कार्यसमिति के पास फैसले लेने का कोई कानूनी अधिकार नहीं बचा था. रीतब्रत बनर्जी ने आयोग को बताया कि 22 जून 2026 को पार्टी का एक विशेष अधिवेशन बुलाया गया था. इस अधिवेशन में अरूप रॉय को राष्ट्रीय कार्यसमिति का नया अध्यक्ष चुना गया. ममता बनर्जी के खेमे ने रीतब्रत बनर्जी और अरूप रॉय के सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया. ममता बनर्जी के कानूनी सलाहकारों और प्रतिनिधियों ने आयोग से कहा कि रीतब्रत बनर्जी द्वारा आयोजित बैठक पूरी तरह फर्जी और असंवैधानिक थी. उस बैठक में लिए गए सभी फैसले और नियुक्तियां पार्टी के संविधान के बिल्कुल खिलाफ हैं. ममता गुट ने आयोग से मांग की कि बागी नेताओं की चिट्ठियों और दावों पर कोई ध्यान न दिया जाए. दोनों पक्षों के तीखे तर्कों को देखते हुए चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को नई दिल्ली में दोनों प्रतिनिधिमंडलों को तलब किया. दोपहर तीन बजे आयोग ने पहले अरूप रॉय और रीतब्रत बनर्जी के गुट की दलीलें सुनीं. इसके ठीक बाद शाम चार बजे ममता बनर्जी के प्रतिनिधिमंडल की बात सुनी गई. दोनों पक्षों के भारी-भरकम दस्तावेजों की जांच के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों ने माना कि मामला गंभीर है. आयोग ने साफ किया कि पैरा 15 के तहत मुख्य विवाद पर अंतिम फैसला बाद में दिया जाएगा. तब तक दोनों गुटों के लिए यह पाबंदी लागू रहेगी.
