सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। याचिका में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 और 2025 के नियमों को चुनौती दी गई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि नागरिकों के निजता अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन जरूरी है। पीठ ने संबंधित प्रावधानों पर रोक लगाने की अर्जी पर भी नोटिस जारी किया और मामला 17 नवंबर के लिए सूचीबद्ध कर दिया। यह विवाद डेटा निजता और पत्रकारिता की स्वतंत्रता के टकराव को केंद्र में लाया है। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन का कहक है कि कानून में पत्रकारिता उद्देश्यों के लिए कोई छूट नहीं दी गई है। यह 2017 के केएस पुट्टस्वामी फैसले के पूर्ण उल्लंघन में है और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत सूचना तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को अनुचित रूप से सीमित करता है। एसोसिएशन का तर्क है कि यह प्रावधान खोजी पत्रकारिता में बाधा डाल सकते हैं, समय संवेदनशील रिपोर्टिंग को रोक सकते हैं और गोपनीय स्रोतों की सुरक्षा को खतरे में डाल सकते हैं। मीडिया की भूमिका पर इसका गंभीर असर पड़ने की आशंका जताई गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने एसोसिएशन की ओर से दलील दी कि ये प्रावधान न्यूज़ रूम को बंद कर देंगे। उन्होंने कहा कि यह संस्थागत या विरासत मीडिया की ओर से शायद पहली व्यापक याचिका है। यदि डेटा प्रिंसिपल की सहमति पर निर्भर रहना पड़े तो समाचार की अवधारणा ही बदल जाएगी। समाचार नया होना चाहिए। अनुमति और सहमति मांगने की प्रक्रिया से न्यूज़ रूम ठप पड़ जाएगा। दीवान ने कहा कि पहले के संस्करणों में पत्रकारिता को छूट थी लेकिन इस कानून में क्यों हटा दी गई यह समझ से परे है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि निर्दोष नागरिकों के अधिकार और मीडिया के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना होगा। आप ही सबसे बेहतर व्यक्ति हैं जो सुझाव दे सकते हैं कि अधिकारों के दुरुपयोग को कैसे रोका जाए। दीवान ने जवाब दिया कि यह कानून पत्रकारिता के लिए था ही नहीं। अनुमति मांगने की व्यवस्था पूर्व सेंसरशिप का पूरा तंत्र बन जाएगी। गलत या गलत रिपोर्टिंग के लिए हम परिणाम भुगतेंगे, लेकिन प्रकाशन से पहले उसे रोकना नहीं जा सकता। मीडिया पहले से ही विनियमित है। प्रकाशकों का कहना है कि सहमति की अनिवार्यता खोजी पत्रकारिता को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी। समय-संवेदनशील खबरों में अनुमति लेना व्यावहारिक रूप से असंभव है। गोपनीय स्रोतों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है। यदि हर जानकारी के लिए डेटा प्रिंसिपल की सहमति जरूरी हुई तो कई महत्वपूर्ण रिपोर्टिंग संभव नहीं हो पाएगी। एसोसिएशन ने जोर दिया कि कानून पत्रकारिता की मूल प्रकृति को नजरअंदाज करता है। निजता के अधिकार के साथ प्रेस की स्वतंत्रता का संतुलन जरूरी है लेकिन वर्तमान प्रावधान इसे बिगाड़ते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को 17 नवंबर के लिए सूचीबद्ध किया है। यह याचिका डेटा सुरक्षा कानून और प्रेस स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी बहस का आधार बनेगी। अदालत का अंतिम रुख न केवल मीडिया बल्कि नागरिकों के निजता अधिकारों को भी प्रभावित करेगा। दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनी जाएंगी। यह मामला डिजिटल युग में पत्रकारिता की चुनौतियों और संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण दोनों को रेखांकित करता है। अदालत का फैसला दूरगामी प्रभाव छोड़ सकता है।

By UJAGAR

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