आतंकवाद के विरुद्ध भारत की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को आगे बढ़ाते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 23 व्यक्तियों को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की चौथी अनुसूची में शामिल करते हुए उन्हें ‘व्यक्तिगत आतंकवादी’ घोषित किया है। मंत्रालय की ओर से जारी राजपत्र अधिसूचना के अनुसार इन व्यक्तियों का संबंध मुख्य रूप से पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा तथा उनके सहयोगी नेटवर्क से बताया गया है। सरकारी एजेंसियों का कहना है कि इन व्यक्तियों पर आतंकवादी गतिविधियों की योजना बनाने, आतंकियों की भर्ती, प्रशिक्षण, हथियारों की आपूर्ति, घुसपैठ और सीमा पार आतंकी ढांचे को सक्रिय रखने जैसे गंभीर आरोप हैं। अधिसूचना के बाद इनके विरुद्ध राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया को और प्रभावी बनाने में सहायता मिलेगी। अधिसूचना में शामिल व्यक्तियों में मसूद इलियास कश्मीरी उर्फ मुफ्ती मसूद इलियास, मोहम्मद मुसादिक, मुफ्ती मोहम्मद असगर खान, हाफिज अब्दुल शकूर, अब्दुल्ला जेहादी, फिरदौस अहमद भट, हारून राशिद गनाई, बिलाल अहमद मीर, आबिद कयूम लोन, नजीर अहमद गुज्जर, अब्दुल रऊफ, अशफाक अहमद, हाफिज खालिद वालीद, मौलाना इमदाद उल्लाह मक्की, मौलाना सैफुल्लाह खालिद, मोहम्मद याकूब, मौलाना यूसुफ ताईबी, ओवैस फारूज, कारी याकूब शेख, राणा इफ्तिखार, वसीम नूर जाट और मोहम्मद शहीद फैसल सहित कई नाम शामिल हैं। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार इन पर आतंकियों की भर्ती, प्रशिक्षण शिविरों का संचालन, हथियार एवं विस्फोटक उपलब्ध कराना, ड्रोन के माध्यम से हथियारों की तस्करी, सीमा पार घुसपैठ तथा भारत में आतंकी हमलों की साजिशों से जुड़े होने के आरोप हैं। इनमें से अनेक व्यक्तियों के पाकिस्तान अथवा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में सक्रिय होने का भी उल्लेख किया गया है। गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के अंतर्गत किसी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित किए जाने का उद्देश्य सुरक्षा एजेंसियों को उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई के लिए अधिक स्पष्ट आधार प्रदान करना है। इस प्रावधान के तहत संबंधित व्यक्ति की गतिविधियों की निगरानी, वित्तीय नेटवर्क की जांच, संपत्तियों पर कार्रवाई, अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से सूचनाओं का आदान-प्रदान तथा अन्य कानूनी प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया जा सकता है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आतंकवादी संगठनों के साथ-साथ उनके प्रमुख संचालकों और नेटवर्क संचालित करने वाले व्यक्तियों को भी कानूनी रूप से चिन्हित करना आतंकवाद विरोधी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि इससे संगठनात्मक ढांचे और वित्तीय तंत्र पर भी दबाव बढ़ता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने सीमा पार आतंकवाद, आतंकी वित्तपोषण और आतंकी नेटवर्क के विरुद्ध बहुस्तरीय रणनीति अपनाई है। इसमें सीमा प्रबंधन को मजबूत करना, आधुनिक निगरानी तकनीकों का उपयोग, ड्रोन के माध्यम से होने वाली तस्करी पर नियंत्रण, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के विरुद्ध सहयोग बढ़ाना तथा आतंकी संगठनों के समर्थकों और संचालकों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई शामिल है। सुरक्षा एजेंसियां लगातार उन व्यक्तियों और संगठनों की पहचान कर रही हैं, जिनकी भूमिका भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों में होने के प्रमाण सामने आते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी कार्रवाइयों से आतंकी नेटवर्क की परिचालन क्षमता और संसाधनों पर प्रभाव पड़ता है तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनके विरुद्ध कार्रवाई का आधार मजबूत होता है। विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान समय में आतंकवाद केवल किसी एक देश की समस्या नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए साझा चुनौती बन चुका है। सीमा पार संचालित आतंकी नेटवर्क, डिजिटल माध्यमों से कट्टरपंथी प्रचार, अवैध वित्तपोषण और आधुनिक तकनीकों के दुरुपयोग ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। ऐसे में आतंकवाद के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई के लिए देशों के बीच खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, वित्तीय निगरानी, कानूनी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से समन्वित प्रयास अत्यंत आवश्यक माने जा रहे हैं। भारत की नवीनतम कार्रवाई को इसी व्यापक आतंकवाद-रोधी नीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करना और आतंकी ढांचे के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना है।

By UJAGAR

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