पश्चिम बंगाल के चीफ इलेक्शन ऑफिसर (CEO) का ऑफिस नए पते पर शिफ्ट कर दिया गया है। यह ऑफिस पहले फेयरली प्लेस में 21 नेताजी सुभाष रोड पर ‘बामर लॉरी’ बिल्डिंग में था, जिसे अब 13 स्ट्रैंड रोड पर शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया बिल्डिंग में शिफ्ट कर दिया गया है। जानकारों का मानना है कि चुनावों को देखते हुए यह बदलाव एडमिनिस्ट्रेटिव इंफ्रास्ट्रक्चर में एक बड़ा फेरबदल है। 2011 में, CEO ऑफिस को राइटर्स बिल्डिंग से फेयरली प्लेस में शिफ्ट किया गया था। तब से, वह बिल्डिंग 14 लंबे सालों तक राज्य के इलेक्शन मैनेजमेंट का ‘नर्व सेंटर’ रही है। चाहे विधानसभा हो या लोकसभा, एक के बाद एक अहम चुनाव वहीं से हुए हैं। देबाशीष सेन, सुनील गुप्ता से लेकर डॉ. एरिज़ आफताब तक, इस ऑफिस ने पूर्व चीफ इलेक्शन ऑफिसर्स की लीडरशिप में कई पॉलिटिकल बदलाव देखे हैं। मौजूदा CEO मनोज कुमार अग्रवाल ने भी कुछ महीने इसी ऑफिस से काम किया था। हालांकि, समय के साथ ऑफिस के काम का दायरा बढ़ा, कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ी। इस वजह से, पुरानी बिल्डिंग की कमियां साफ होती जा रही थीं। जगह की कमी थी, साथ ही सिक्योरिटी और इंफ्रास्ट्रक्चर की दिक्कतें भी थीं। खासकर महिलाओं के लिए सही टॉयलेट की कमी, मीटिंग या कॉन्फ्रेंस के लिए खास जगह की कमी, इन सभी वजहों से नए पते की ज़रूरत महसूस हुई। इसी सिलसिले में यह बदलाव हो रहा है। नई बिल्डिंग में ज़्यादा जगह, बेहतर सुविधाएं और मॉडर्न मैनेजमेंट का वादा किया गया है। अग्रवाल के शब्दों में, “अब हमें बाहर मीटिंग नहीं करनी पड़ेगी। सारे इंतज़ाम हम अपने अंदर ही कर लेंगे।” इस बीच, वोटिंग का शेड्यूल पहले ही अनाउंस हो चुका है। 23 और 29 अप्रैल को दो फेज में वोटिंग होगी और 4 मई को नतीजे आएंगे। चुनाव के नियम भी जारी कर दिए गए हैं। पॉलिटिकल पार्टियां पूरी ताकत से मैदान में उतर चुकी हैं। लेकिन इस बीच, एक बड़ा सवाल बना हुआ है – करीब 60 लाख वोटरों की किस्मत अभी भी ‘ट्रायल’ स्टेट में अटकी हुई है। सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट के बारे में CEO ने कहा कि ट्रिब्यूनल बनाने का प्रोसेस शुरू हो गया है। जजों की पहचान और नोटिफिकेशन जारी करने का काम पहले ही पूरा हो चुका है। इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होते ही काम शुरू हो जाएगा। चुनाव से पहले इस अनिश्चितता का कितना असर होगा, इसे लेकर राजनीतिक हलकों में काफी अटकलें लगाई जा रही हैं। चूंकि नया ऑफिस एडमिनिस्ट्रेटिव स्पीड बढ़ाने का वादा कर रहा है, इसलिए अब फोकस उन 60 लाख वोटर्स पर है। लोकतंत्र के त्योहार से पहले उनके अधिकार पक्के करना अब सबसे बड़ी चुनौती है।
