दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ यानी डीयूएसयू चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने तीन महत्वपूर्ण पदों पर जीत दर्ज की है। एबीवीपी के यश डबास अध्यक्ष पद पर विजयी रहे। रिया छाबड़ी ने सचिव पद हासिल किया और लक्ष्य राज सिंह संयुक्त सचिव पद पर चुने गए। उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने बाजी मारी। इन नतीजों से विश्वविद्यालय परिसर में एबीवीपी की मजबूत पकड़ एक बार फिर साबित हुई है। छात्रसंघ चुनाव के नतीजों का लंबे समय से इंतजार किया जा रहा था। माना जा रहा है कि नॉर्थ कैंपस में एबीवीपी का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा। इस कैंपस में एसआरसीसी, हिंदू हंसराज, केएमसी रामजस और लॉ फैकल्टी जैसे देश के प्रमुख कॉलेज शामिल हैं। इन कॉलेजों में एबीवीपी उम्मीदवारों को अच्छा समर्थन मिला। नॉर्थ कैंपस की जीत ने समग्र नतीजों को प्रभावित किया। छात्रों ने विकास और राष्ट्रवाद की सोच वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी। एबीवीपी ने इसे युवा भारत की सोच से जोड़ा है। परिसर में चुनावी माहौल अंत तक गर्म रहा। भाजपा का कहना है कि डीयूएसयू में एबीवीपी की यह जीत बड़ा संदेश है। इससे पता चलता है कि युवा और आगे बढ़ने की चाह रखने वाला भारत विकास और राष्ट्रवाद की सोच से जुड़ा है। कांग्रेस ने युवाओं को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन वे झूठ के झांसे में नहीं आए। झूठ की गूंज दिल्ली विश्वविद्यालय में नहीं सुनाई दी, जो मिनी इंडिया माना जाता है। एनएसयूआई, जिसका पहले लंबे समय तक दबदबा था, अब शून्य पर है। युवा कांग्रेस की राजनीति के तरीके के खिलाफ हैं। भाजपा ने इसे सकारात्मक नतीजा बताया। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ को मिनी इंडिया कहा जाता है क्योंकि यह देश की सबसे मुख्यधारा और विविधतापूर्ण यूनिवर्सिटी है। यहां देशभर के छात्र पढ़ते हैं, इसलिए चुनाव नतीजे व्यापक संदेश देते हैं। एबीवीपी की जीत को परिसर में राष्ट्रवादी और विकासवादी सोच की जीत के रूप में देखा जा रहा है। छात्रसंघ विश्वविद्यालय की गतिविधियों और छात्रों के मुद्दों को उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नए पदाधिकारियों से छात्रों की अपेक्षाएं अधिक हैं। नतीजों ने परिसर की राजनीति को नई दिशा दी है। नवनिर्वाचित पदाधिकारियों को छात्रों के मुद्दों जैसे सुविधाएं सुरक्षा और शैक्षणिक माहौल सुधारने पर ध्यान देना होगा। एबीवीपी की तीन पदों पर जीत के बावजूद उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार की सफलता दिखाती है कि छात्र स्वतंत्र विकल्प भी चुनते हैं। परिसर में सभी पक्षों को मिलकर काम करने की जरूरत है। डीयूएसयू चुनाव हमेशा से विश्वविद्यालय की राजनीति का आईना रहे हैं। इस बार के नतीजे युवा मतदाताओं की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करते हैं। नए नेतृत्व से छात्रों को बेहतर प्रतिनिधित्व मिलने की उम्मीद है।
