ग्रेट निकोबार द्वीप भौगोलिक दृष्टि से भारत के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक माना जाता है। यह द्वीप विश्व के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों के निकट स्थित है, जहां से प्रतिदिन बड़ी संख्या में तेल टैंकर और मालवाहक जहाज गुजरते हैं। ऐसे में यहां आधुनिक बुनियादी ढांचे का विकास भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी रणनीतिक उपस्थिति और प्रभाव बढ़ाने का अवसर देगा। बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक नियंत्रण किसी भी देश की शक्ति का महत्वपूर्ण आधार बन चुके हैं और ग्रेट निकोबार परियोजना इसी दिशा में एक दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखी जा रही है। परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट का निर्माण है। वर्तमान में भारत के बड़े हिस्से का कंटेनर ट्रांसशिपमेंट विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से होता है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ते हैं। ग्रेट निकोबार में विकसित होने वाला आधुनिक बंदरगाह इस निर्भरता को कम करने में मदद कर सकता है। इससे न केवल भारतीय निर्यातकों और आयातकों को लाभ मिलेगा बल्कि देश वैश्विक समुद्री लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में भी अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना भारत को क्षेत्रीय समुद्री व्यापार के प्रमुख केंद्रों में शामिल करने की क्षमता रखती है। ग्रेट निकोबार का महत्व केवल आर्थिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। प्रस्तावित हवाई अड्डा, नौसैनिक सुविधाएं और अन्य सैन्य अवसंरचना भारतीय नौसेना तथा सुरक्षा एजेंसियों की परिचालन क्षमता को मजबूत बनाएंगे। हिंद महासागर में बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा और समुद्री चुनौतियों के बीच यह क्षेत्र निगरानी, त्वरित प्रतिक्रिया और समुद्री सुरक्षा अभियानों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। इसके अलावा प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत और बचाव कार्यों को भी अधिक प्रभावी ढंग से संचालित करने में सहायता मिलेगी। परियोजना के तहत प्रस्तावित ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा केवल सामरिक जरूरतों को पूरा नहीं करेगा बल्कि पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति देगा। सरकार का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन सकता है। आधुनिक टाउनशिप, बेहतर सड़क संपर्क, ऊर्जा अवसंरचना और अन्य नागरिक सुविधाओं के विकास से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलेगा। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होने और क्षेत्रीय विकास को गति मिलने की संभावना है। हवाई अड्डे और अन्य प्रमुख परियोजनाओं के लिए कई संभावित स्थलों का तकनीकी अध्ययन किया गया था। इस प्रक्रिया में भूगोल, पर्यावरणीय प्रभाव, जनजातीय आबादी, वन्यजीव संरक्षण और निर्माण संबंधी चुनौतियों का विस्तृत मूल्यांकन किया गया। विशेषज्ञों ने पाया कि गलाथिया बे अपेक्षाकृत अधिक उपयुक्त विकल्प है, क्योंकि यहां आवश्यक अवसंरचना का विकास अपेक्षाकृत कम पर्यावरणीय और तकनीकी बाधाओं के साथ संभव है। सरकार का कहना है कि चयन प्रक्रिया में वैज्ञानिक और तकनीकी मानकों को प्राथमिकता दी गई है ताकि दीर्घकालिक विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बना रहे। ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई सवाल भी उठे हैं। द्वीप अपनी जैव विविधता, घने जंगलों, प्रवाल भित्तियों और दुर्लभ वन्यजीवों के लिए जाना जाता है। सरकार का दावा है कि परियोजना के लिए विस्तृत पर्यावरण प्रभाव आकलन कराया गया है और सभी आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है। विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों की भागीदारी के साथ यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि विकास गतिविधियों का प्रभाव न्यूनतम रहे और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा बनी रहे। सरकार ने परियोजना के साथ-साथ दीर्घकालिक पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रम भी तैयार किया है। इसके तहत दुर्लभ लेदरबैक कछुओं, निकोबार मेगापोड पक्षियों, मगरमच्छों, मैंग्रोव वनों और प्रवाल भित्तियों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। अगले 30 वर्षों के लिए तैयार की गई इस योजना पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाने का प्रस्ताव है। सरकार का कहना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों को समान महत्व देते हुए ग्रेट निकोबार को एक संतुलित और टिकाऊ मॉडल के रूप में विकसित किया जाएगा।

By UJAGAR

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