करीब 40 साल पुराने बोफोर्स घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आखिरी याचिका भी खारिज कर दी। इसके साथ ही अब यह मामला पूरी तरह खत्म हो गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब इस केस में आगे सुनवाई की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने 2005 के दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली अपील भी सुनने से मना कर दिया, जिसमें हिंदुजा ब्रदर्स और बोफोर्स कंपनी को बरी कर दिया गया था।सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ आखिरी अपील को खारिज कर दिया, जिसके बाद अब इस मामले का कानूनी चैप्टर खत्म हो गया है. कांग्रेस के लिए बोफोर्स डील सिर्फ एक कानूनी लड़ाई नहीं रही है. 1989 से लेकर अब तक ये भ्रष्टाचार का पर्याय का संकेत बन चुकी है, जिसका इस्तेमाल हर चुनावों में विरोधी दल कांग्रेस के खिलाफ करते रहे हैं. खासकर बीजेपी, संसद हो, चुनाव प्रचार हो या सार्वजनिक भाषण. कांग्रेस के खिलाफ बोफोर्स डील को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती रही है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह विवाद अदालत से इतर भी है और करीब 40 साल बाद भी कांग्रेस पर एक धब्बे की तरह निशान छोड़ रहा है. संसद हो या सार्वजनिक भाषण विरोधी नेता अकसर कांग्रेस पर बोफोर्स घोटाले का आरोप लगाते रहे हैं. दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2005 में बोफोर्स मामले में हिंदुजा ब्रदर्स के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी थी. हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी, जिसे शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया है. अब इस मामले में कोई आगे की अदालती कार्यवाही नहीं होने की वजह से ये कहा जा सकता है कि बोफोर्स मामला करीब 40 साल बाद अब अपने निष्कर्ष पर पहुंच गया है. बोफोर्स का विवाद अप्रैल, 1987 में शुरू हुआ जब स्वीडिश रेडियो ने आरोप लगाया कि स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी बोफोर्स से 155 मिमी हॉवित्जर खरीदने के लिए भारत के 1,437 करोड़ रुपये के सौदे में रिश्वत दी गई थी. हालांकि राजीव गांधी सरकार ने इन आरोपों का खंडन किया और खुद पीएम राजीव ने लगातार यही कहा कि न तो उन्होंने और न ही उनकी सरकार ने रिश्वत ली थी. इस मामले में उन पर कभी चार्जशीट दायर नहीं की गई और न ही किसी अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया. यह मामला 1986 में भारत सरकार और स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुई 1,437 करोड़ रुपए की तोप खरीद डील से जुड़ा है। 1987 में खुलासा हुआ कि इस सौदे को हासिल करने के लिए कथित रूप से कमीशन (रिश्वत) दिया गया। घोटाले के आरोप से राजीव गांधी 1989 का चुनाव हार गए थे। इसके बाद यह मामला देश के सबसे बड़े राजनीतिक घोटालों में शामिल हो गया। इसके बाद जनवरी 1990 में सीबीआई ने मामला दर्ज किया। इसके बाद पूर्व बोफोर्स अध्यक्ष मार्टिन आर्डबो, कथित बिचौलिये विन चड्ढा, हिंदुजा बंधुओं और बाद में इतालवी कारोबारी ओत्तावियो क्वात्रोच्ची समेत कई लोगों के खिलाफ जांच हुई। समय के साथ कई आरोपी या तो बरी हो गए या उनका निधन हो गया।
