गृह मंत्रालय (MHA) ने ‘फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंड रूल्स, 2026’ (विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन नियम) को संशोधित किया है। इसमें धार्मिक श्रेणी के तहत स्वीकार्य गतिविधियों को वर्गीकृत करने के लिए एक विस्तृत ढांचा पेश किया गया है और साथ ही भारत में विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए अनुपालन आवश्कताओं को सख्त किया गया है। यह संशोधन ‘फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंड रूल्स, 2011’ में बदवाल करता है और एक विशेष अनुसूची पेश करता है जिसमें धार्मिक उद्देश्यों के तहत पंजीकरण के लिए पात्र गतिविधियों की रूपरेखा दी गई है। सूचीबद्ध गतिविधियों में पूजा स्थलों जैसे- मंदिर, मस्जिद, चर्चा, गुरुद्वारों, मठ, सिनेगॉग और अन्य धार्मिक स्थलों का निर्माण, नवीनीकरण और रखरखाव शामिल है। इसके अलावा धार्मिक ग्रंथों और टीकाओं के संरक्षण, मुद्रण, अनुवाद और डिजिटलीकरण, धार्मिक दर्शन एवं इतिहास के अध्ययन से जुड़े संस्थानों को समर्थन, तथा तीर्थयात्रियों के लिए पेयजल, स्वच्छता और आश्रय जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की भी अनुमति दी गई है। नियमों के तहत धर्मशाला, लंगर, अन्नदान और सामुदायिक रसोई जैसी गतिविधियां भी धार्मिक उद्देश्यों के अंतर्गत मान्य होंगी। नई व्यवस्था में धार्मिक शिक्षा, नैतिक शिक्षण, सत्संग, प्रवचन, ध्यान शिविर, भक्ति संगीत, धार्मिक नाट्य कला तथा आदिवासी और स्वदेशी आस्था परंपराओं के संरक्षण को अनुमति दी गई है। हालांकि मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि धर्मांतरण से जुड़ी किसी भी गतिविधि को अनुमति नहीं होगी। संशोधन के तहत ‘की फंक्शनरी’ (Key Functionary) शब्द को शामिल किया गया है। अब किसी संस्था के निदेशक, ट्रस्टी, साझेदार, पदाधिकारी, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के कर्ता तथा संगठन के संचालन और नियंत्रण से जुड़े अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों को भी जवाबदेही के दायरे में लाया गया है। अब FCRA पंजीकरण प्रमाणपत्र में संगठन को अपने सटीक उद्देश्य और भौगोलिक कार्यक्षेत्र का उल्लेख करना अनिवार्य होगा। संस्थाओं को निर्धारित अनुसूची में शामिल उद्देश्यों में से ही चयन करना होगा और यह भी बताना होगा कि वे किन राज्यों या केंद्रशासित प्रदेशों में कार्य करेंगी। पहले से पंजीकृत संगठनों को यह जानकारी सोशल करने के लिए एक वर्ष का समय दिया गया है। नए नियमों के अनुसार, जिन संगठनों में भारतीय मूल के अलावा अन्य विदेशी नागरिक प्रमुख पदों पर होंगे, उन्हें सामान्यतः FCRA पंजीकरण नहीं मिलेगा। हालांकि विशेष परिस्थितियों में सरकार अनुमति दे सकती है। संस्थाओं को अगली किस्त प्राप्त करने से पहले पहले मिले विदेशी फंड का कम से कम 75 प्रतिशत उपयोग करना होगा। इसके अलावा फंड के उपयोग से जुड़े उचित गतिविधि मानकों को भी परिभाषित किया गया है। संशोधित नियमों के तहत गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को अपने सोशल मीडिया अकाउंट, वेबसाइट और पुस्तकों, पत्रिकाओं तथा लेखों जैसे प्रकाशनों की जानकारी भी देनी होगी। इससे विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं की गतिविधियों की निगरानी और पारदर्शिता बढ़ाने का उद्देश्य है। सरकार ने शुल्क व्यवस्था में भी संशोधन किया है। अब कई राज्यों में कार्यरत या एक से अधिक उद्देश्यों के लिए पंजीकरण कराने वाले संगठनों को अतिरिक्त शुल्क देना पड़ सकता है। गृह मंत्रालय का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य विदेशी फंडिंग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और सुव्यवस्थित बनाना है। साथ ही धार्मिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्रों में अनुमेय गतिविधियों का स्पष्ट वर्गीकरण सुनिश्चित करना भी इसका लक्ष्य है। गौरतलब है कि FCRA कानून पहली बार 1976 में लागू किया गया था, जिसे बाद में 2010 में नए कानून से प्रतिस्थापित किया गया। FCRA पंजीकरण की वैधता पाँच वर्ष की होती है और इसके बाद नवीनीकरण कराना आवश्यक होता है।
