संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने जा रहा है. इस सत्र से पहले देश की राजनीति में एक बहुत बड़ा भूचाल आने वाला है. लोकसभा स्पीकर ओम बिरला अगले कुछ दिनों में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाने वाले हैं. यह फैसला पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और महाराष्ट्र के नेता उद्धव ठाकरे का सियासी भविष्य तय करेगा. तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना यूबीटी के बागी सांसदों पर अयोग्यता की तलवार लटक रही है. ममता की पार्टी के 20 और उद्धव की पार्टी के 6 सांसद बगावत कर चुके हैं. स्पीकर ओम बिरला इन बागी सांसदों के दलबदल और मर्जर विवाद पर अपना अंतिम फैसला सुनाएंगे. इस फैसले से साफ हो जाएगा कि क्या इन बागियों की सांसदी बचेगी या उन्हें घर बैठना पड़ेगा. इस बगावत ने विपक्ष के खेमे में भारी खलबली मचा दी है. ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस को बहुत बड़ा झटका लगा है. पार्टी के 20 सांसदों ने बगावत का रास्ता चुन लिया है. इन सभी सांसदों ने एक नई पार्टी नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई का दामन थाम लिया है. इस पार्टी का हेडक्वार्टर पश्चिम बंगाल के हावड़ा में स्थित है. इन बागी सांसदों ने लोकसभा में अपने लिए अलग सीटिंग अरेंजमेंट की मांग की है. इसके साथ ही उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार के प्रति अपनी वफादारी भी जाहिर की है. वे सभी केंद्र में रूलिंग नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस यानी एनडीए में शामिल होना चाहते हैं. साल 2024 के जनरल इलेक्शन में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर कुल 29 सांसद चुनाव जीते थे. उनमें से एक सांसद का निधन हो चुका है और वह सीट अभी खाली है. अब 20 सांसदों के अलग होने से ममता बनर्जी की पार्टी संसद में बहुत कमजोर हो जाएगी. अभिषेक बनर्जी ने इन सभी 20 बागी सांसदों के खिलाफ अलग-अलग पिटीशन फाइल की है. वे इन सभी को तुरंत अयोग्य घोषित करने की मांग कर रहे हैं. महाराष्ट्र की सियासत में भी उद्धव ठाकरे की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. शिवसेना यूबीटी के टिकट पर पिछले जनरल इलेक्शन में 9 सांसद जीतकर लोकसभा पहुंचे थे. अब इन 9 सांसदों में से 6 सांसदों ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ दिया है. ये सभी 6 बागी सांसद महाराष्ट्र के डिप्टी चीफ मिनिस्टर एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिव सेना में शामिल हो गए हैं. उद्धव ठाकरे गुट ने इन सभी सांसदों को अयोग्य ठहराने के लिए स्पीकर के सामने अपनी बात रखी है. उद्धव गुट का कहना है कि पार्टी से अलग हुआ कोई भी ग्रुप सीधे तौर पर असली पार्टी होने का दावा नहीं कर सकता. एंटी-डिफैक्शन लॉ के तहत इन सांसदों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए. दूसरी तरफ शिंदे गुट का दावा है कि उनके पास विधायी विंग का दो-तिहाई बहुमत है. इस वजह से उनकी सदस्यता पर कोई आंच नहीं आएगी. अब देखना होगा कि इस लड़ाई में जीत किसकी होती है. इस पूरे विवाद में अब आखिरी और सबसे बड़ा फैसला लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को ही लेना है. संविधान की दसवीं अनुसूची यानी एंटी-डिफेक्शन लॉ के तहत स्पीकर का फैसला सर्वोपरि होता है. ओम बिरला इस समय दोनों पार्टियों के दावों और कानूनी बारीकियों का बारीकी से एनालिसिस कर रहे हैं. शनिवार को ओम बिरला ने कहा, ‘एंटी-डिफेक्शन लॉ में बदलाव करना राजनीतिक दलों का काम है.’ इसके लिए उन्होंने पीठासीन अधिकारियों की एक कमेटी भी बनाई थी जो इस कानून के फ्रेमवर्क का रिव्यू कर रही है. लेकिन मौजूदा मामलों में फैसला मौजूदा कानून के हिसाब से ही होगा. स्पीकर के फैसले पर ही इन 26 सांसदों का भविष्य निर्भर करता है. अगर स्पीकर ने मर्जर को सही मान लिया तो बागियों की चांदी हो जाएगी. अगर पिटीशन मंजूर हो गई तो इन सभी की सदस्यता खत्म हो जाएगी. इस पूरे मामले का सबसे पेचीदा हिस्सा एंटी-डिफैक्शन लॉ का दो-तिहाई वाला नियम है. बागी गुटों का तर्क है कि उनके पास सदन के अंदर दो-तिहाई सांसदों का समर्थन है. इसलिए उनका मर्जर पूरी तरह से लीगल है. लेकिन मूल पार्टियां इस दलील को खारिज कर रही हैं. तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना यूबीटी का कहना है कि सिर्फ विधायी विंग का दो-तिहाई होना काफी नहीं है. इसके लिए पूरी राजनीतिक पार्टी के संगठन का दो-तिहाई हिस्सा मर्ज होना चाहिए. कानून की इसी व्याख्या पर पूरा फैसला टिका हुआ है. अगर स्पीकर केवल सदन के अंदर के बहुमत को मान्यता देते हैं तो दलबदल आसान हो जाएगा. लेकिन अगर संगठन के बहुमत को जरूरी माना गया तो इन बागी सांसदों की मुश्किलें बहुत बढ़ जाएंगी. यह कानूनी व्याख्या देश के संसदीय इतिहास में एक नया उदाहरण सेट करेगी. लोकसभा सचिवालय केवल अयोग्यता पर ही नहीं, बल्कि एक और जरूरी काम पर एक्टिव है. मानसून सेशन के लिए संसद के अंदर नया सीटिंग अरेंजमेंट तैयार किया जा रहा है. बागी सांसदों को विपक्ष की बेंचों से हटाकर अलग जगह दी जा सकती है. इसके अलावा साउथ की बड़ी पार्टी डीएमके ने भी कांग्रेस से अलग सीटिंग अरेंजमेंट की मांग की है. डीएमके ने हाल ही में कुछ नए राजनीतिक समीकरणों के तहत यह कदम उठाया है. संसद के अंदर सीटों का यह नया नक्शा देश की बदलती राजनीति को साफ-साफ दिखाएगा. विपक्षी गठबंधन के लिए यह एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका होगा. सदन के अंदर की यह नई तस्वीर जनता को भी साफ संदेश देगी कि दिल्ली की सत्ता में अब समीकरण बदल चुके हैं.
