प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवास 7, लोक कल्याण मार्ग के आसपास स्थित रेस कोर्स क्षेत्र की तीन झुग्गी बस्तियों को खाली कराने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम आदेश दिया है। अदालत ने भाई राम कैंप, डीआईडी कैंप और मस्जिद कैंप के निवासियों को बस्तियां खाली करने के लिए छह सप्ताह यानी 42 दिन का समय दिया है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने पहले दिए गए उस आदेश में बदलाव किया, जिसमें निवासियों को केवल 15 दिनों में जगह खाली करने को कहा गया था। अब प्रभावित परिवारों को पुनर्वास की व्यवस्था के साथ छह सप्ताह की मोहलत दी गई है। केंद्र सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि ये बस्तियां बेहद संवेदनशील क्षेत्र में स्थित हैं और इनके आसपास महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठान तथा ऑपरेशनल एयरफोर्स स्टेशन मौजूद हैं। सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और वीवीआईपी सुरक्षा का हवाला देते हुए कहा कि इस इलाके में अनधिकृत निर्माण और बस्तियों की मौजूदगी सुरक्षा के लिहाज से गंभीर चिंता का विषय है। इसी आधार पर क्षेत्र को खाली कराया जाना जरूरी बताया गया। अदालत ने केवल बेदखली का आदेश देने के बजाय प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को लेकर भी कई निर्देश दिए हैं। करीब 700 परिवारों को बाहरी दिल्ली के सावदा घेवरा स्थित DUSIB कॉलोनी में स्थानांतरित किया जाना है। पुनर्वास प्रक्रिया की निगरानी के लिए अदालत ने पूर्व जिला न्यायाधीश मनमोहन शर्मा की अध्यक्षता में सात सदस्यीय निगरानी समिति गठित की है। समिति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि स्थानांतरण के दौरान पात्र परिवारों को निर्धारित सुविधाएं मिलें। दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (DUSIB) को निवासियों के घरेलू सामान को नई जगह तक मुफ्त पहुंचाने का निर्देश दिया गया है।

इसके अलावा पुनर्वास पैकेज में:

  • प्रति परिवार ₹1.12 लाख के लाभार्थी अंशदान का वहन सरकार द्वारा किया जाएगा।
  • परिवारों को एक वर्ष के लिए मेट्रो कार्ड उपलब्ध कराने की व्यवस्था होगी।
  • परिवार के एक सदस्य को मुफ्त बस पास दिया जाएगा।
  • नई कॉलोनी में स्कूल, अस्पताल, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।
  • पात्र परिवारों के लिए एलपीजी कनेक्शन की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाएगी।

प्रभावित निवासियों की ओर से अदालत में दलील दी गई कि सावदा घेवरा उनके वर्तमान निवास से करीब 40-45 किलोमीटर दूर है। अधिकांश परिवारों के सदस्य मध्य दिल्ली में ड्राइवर, घरेलू सहायकों और दैनिक मजदूरों के रूप में काम करते हैं। उनका कहना था कि इतनी दूर स्थानांतरण होने से रोजाना काम पर पहुंचना मुश्किल होगा और परिवारों की आय पर सीधा असर पड़ सकता है। हाईकोर्ट ने माना कि आजीविका और पुनर्वास से जुड़ी चिंताएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि वैकल्पिक स्थान पर पर्याप्त नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, तो सुरक्षा कारणों से स्थानांतरण किया जा सकता है। छह सप्ताह की समयसीमा समाप्त होने के बाद भी यदि जमीन खाली नहीं की जाती है, तो जरूरत पड़ने पर पुलिस की सहायता से कार्रवाई की जा सकती है। इस तरह अदालत के आदेश में राष्ट्रीय सुरक्षा, पुनर्वास और प्रभावित परिवारों की बुनियादी जरूरतों—तीनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है।

By UJAGAR

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *