नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के परिसर में स्थित बांकड़ा मस्जिद, जिसे गौरीपुर जामा मस्जिद भी कहा जाता है, 136 वर्ष पुरानी है। यह विमान के उड़ान और लैंडिंग के लिए उपयोग होने वाले सेकेंडरी रनवे के उत्तरी छोर से लगभग 165 मीटर की दूरी पर स्थित है। इस मस्जिद का निर्माण वर्ष 1890 में हुआ था। उस समय बांकड़ा और गौरीपुर क्षेत्र के लोग खुले मैदान में नमाज अदा करते थे। इसी कारण यहां मस्जिद बनाने की पहल की गई। ब्रिटिश शासन के दौरान वर्ष 1920 में कोलकाता हवाई अड्डे की स्थापना हुई। शुरुआत में हवाई अड्डा छोटा था, इसलिए मस्जिद उसके परिसर के बाहर थी। बाद में हवाई अड्डे के आधुनिकीकरण और सेकेंडरी रनवे के निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण किया गया। उस दौरान आसपास की सभी बस्तियों और गांवों को हटाया गया, लेकिन स्थानीय ग्रामीणों के साथ सहमति बनने के बाद मस्जिद को वहीं रहने दिया गया। अंतरराष्ट्रीय विमानन नियमों के अनुसार, रनवे से कम से कम 240 मीटर की दूरी पर ही कोई स्थायी निर्माण होना चाहिए। मस्जिद रनवे के बेहद करीब होने के कारण घने कोहरे और खराब मौसम में बड़े विमानों के लिए इस रनवे पर सुरक्षित उड़ान और लैंडिंग में कठिनाई होती है। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के चलते इस मस्जिद में आम लोगों का प्रवेश नहीं था। केवल आसपास के कुछ निर्धारित गांवों के लोगों को CISF द्वारा यशोर रोड स्थित गेट नंबर 7 से विशेष बस के जरिए विमान संचालन क्षेत्र के भीतर लगभग 225 मीटर का रास्ता तय कराकर नमाज पढ़ने के लिए ले जाया जाता था। इससे हवाई अड्डे की समग्र सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता था। जब किसी कारणवश मुख्य रनवे बंद रहता है या उस पर रखरखाव का कार्य चलता है, तब सेकेंडरी रनवे का उपयोग किया जाता है। लेकिन मस्जिद के कारण इस रनवे पर लगातार दो विमानों की उड़ान या लैंडिंग के बीच अधिक समय का अंतर रखना पड़ता है। इससे कोलकाता हवाई अड्डे की कुल रनवे क्षमता (Runway Capacity) घट जाती है और उड़ानों में देरी होती है।

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